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ऐम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी सेंटर, बिना चीर फाड़ होगा पोस्टमार्टम…!!!!

भोपाल: 6 जनवरी 2025

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल जल्द ही फॉरेंसिक मेडिकल जांच के क्षेत्र में बड़ी तकनीकी छलांग लगाने जा रही है। अब पोस्टमॉर्टम के लिए शव की चीरफाड़ जरूरी नहीं होगी। एम्स भोपाल में अत्याधुनिक वर्चुअल ऑटोप्सी सेंटर स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसे केंद्र सरकार से सैद्धांतिक स्वीकृति मिल चुकी है। इस नई व्यवस्था के तहत शव की जांच हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनिंग और 3-डी इमेजिंग तकनीक से की जाएगी। इससे मौत के कारणों का सटीक विश्लेषण संभव होगा, वह भी बिना किसी सर्जिकल प्रक्रिया के। यह तकनीक अभी तक जापान सहित कुछ विकसित देशों तक सीमित थी, लेकिन अब भोपाल भी इस सूची में शामिल होने जा रहा है।

वित्तीय स्वीकृति की दिशा में कदम

एम्स भोपाल प्रबंधन ने इस परियोजना का विस्तृत प्रस्ताव हाल ही में भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी के सामने रखा है। इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दे चुका है। अब वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों की सहमति के बाद फंड जारी होने का रास्ता साफ हो जाएगा। भोपाल के सांसद आलोक शर्मा के अनुसार, बैठक में प्रस्ताव को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और जल्द ही परियोजना को औपचारिक स्वीकृति मिलने की उम्मीद है। मंजूरी मिलते ही एम्स भोपाल प्रदेश का पहला ऐसा संस्थान बन जाएगा, जहां वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा उपलब्ध होगी।

डिजिटल सबूत होंगे ज्यादा मजबूत

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्चुअल ऑटोप्सी से तैयार रिपोर्ट पारंपरिक पोस्टमॉर्टम की तुलना में कहीं अधिक सटीक और सुरक्षित होती है। इस तकनीक में मौत के कारण से जुड़े हर पहलू को डिजिटल रूप में रिकॉर्ड किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि मौत किसी नस में रुकावट के कारण हुई हो, तो पूरी रक्त प्रणाली, प्रभावित अंग और संबंधित नस की क्लोज़-अप 3डी तस्वीर उपलब्ध होगी। यह डेटा लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और कोर्ट में ठोस डिजिटल साक्ष्य के रूप में पेश किया जा सकेगा।

परिजनों को राहत, विवादों में कमी

पोस्टमॉर्टम को लेकर परिजनों और अस्पताल प्रशासन के बीच अक्सर टकराव की स्थिति बन जाती है, खासकर तब जब परिवार धार्मिक या सामाजिक कारणों से चीरफाड़ का विरोध करता है। वर्चुअल ऑटोप्सी इस समस्या का समाधान बनकर सामने आ रही है। इसमें शरीर को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंचती, जिससे शव को सम्मानजनक स्थिति में परिजनों को सौंपा जा सकेगा।

समय की बचत और सुरक्षा

फॉरेंसिक विभाग के अनुसार पारंपरिक पोस्टमॉर्टम में जहां कई घंटे लग जाते हैं, वहीं वर्चुअल ऑटोप्सी महज 30 मिनट में पूरी की जा सकती है। सड़क हादसों, ट्रॉमा केस और संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में यह तकनीक बेहद कारगर साबित होगी। महामारी जैसे हालात में यह मेडिकल स्टाफ को संक्रमण के खतरे से भी बचाती है।

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